डार्क हॉर्स - एक अनकही दास्ताँ उर्फ़ 'बड़े भाईसाहब' लोगों की दास्ताँ

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  • Author:नीलोत्पल मृणाल
  • Publisher:शब्दारम्भ प्रकाशन
  • Price:150
  • Release Date:11/4/2015

डार्क हॉर्स (उपन्यास)

लेखक- नीलोत्पल मृणाल

शब्दारंभ प्रकाशन, दिल्ली

मूल्य ₹150/

-बुक संस्करण

www.notnul.com पर₹90/- में  उपलब्ध

डार्क हॉर्स उर्फ़'बड़े भाई साहब' लोगोंकी दास्तान

उपन्यासकार ने भूमिकामें उपन्यास कोअंग्रेज़ी नाम 'डार्क हॉर्स'देने का बसज़िक्र भर कियाहै और पूराउपन्यास पढ़ने का अनुरोधकिया है शीर्षकका आशय जाननेके लिए। मैंभी इस रिव्यूका शीर्षक कुछऔर रख सकताथा लेकिन नहींचाहता था किपूरे उपन्यास की कुंजीशीर्षक में ही डालदूँ और उपन्यासपढ़ने का मज़ाही बिगाड़ दूँ।यह कहानी कोईप्रेमचंद की कहानी'बड़े भाई साहब' नहींहै जो दरजोंका खेल हो।पढ़ कर एक-एक दरजापास करते डिग्रीपाना एक अलगबात है औरविशेष अध्ययन प्रक्रिया सेगुज़रते हुए कोई कम्पीटीशनकी तैयारी करनाऔर पास करनाबिलकुल अलग ही बातहै। जब यहकम्पीटीशन आइएएस और दूसरीसिविल सर्विसेज़ का होतो बात बिलकुलअलग हो जातीहै। यह उपन्यासहमें बताता है कैसेहम बड़े भाईसाहब के युगसे निकल करडार्क हॉर्स कथानक युगमें प्रवेश करचुके हैं।

शिल्प

पूरा उपन्यास थ्रिलरशैली में लिखा गयाहै। घटनाएँ घटतीजाती हैं और कहानीअपनी बात कहते हुएआगे बढ़ती जातीहै। शैली कीस्पीड बिलकुल वैसी हैजो स्पीलबर्ग कीफ़िल्म 'स्पीड' के नाममें झलकता है।यह ज़माना धीमीगति का ज़मानानहीं है। इतनी तेज़गति से कहानीआगे बढ़ती हैकि ब्रेक लगानामुश्किल हो जाताहै। उपन्यास कीगति और शिल्पऐसा है किएक बैठकी मेंही ख़त्म करनेकी माँग करताहै।

कथानकऔर कथ्य

उपन्यासों को पढ़नेके दौरान एकज़हमत और उठानापड़ती है, समय-समयऔर क़दम-क़दमपर आदर्श, दर्शनऔर ज्ञान काछौंका पढ़नेकी। मैं ऐसेउपन्यासों की अवमाननानहीं करना चाहता लेकिनकभी-कभी बातेंबड़ी बोझिल हो जातीहैं और कहानीके निर्वाह मेंबाधा डालती हैं। समीक्षागतउपन्यास ऐसा नहीं हैकि यह एकथ्रिलर भर हैजो कहानी केमाध्यम से चलतीरहती है औरयहाँ आत्मावलोकन की कोईजगह नहीं है।कथ्य ही कुछऐसा है किआप बिना सोचेआगे नहीं बढ़सकते। आप पाएँगेकि हर प्रकरणऔर हर वाक्यके बाद आपअपने समय के 'मुखर्जीनगर'में पहुँच जाएंगे।'पीटी के प्रेशरसे पूरा मुखर्जीनगर उबल रहाथा। हर कानसे भाप निकलरही थी औरहर दिमाग़ कीसीटी बजी हुई थी।'ऐसे वाक्य भरेपड़े हैं इस उपन्यासमें जो हमेंखुद अपनी ज़िन्दगीके पीछे केअध्याय में ला पटकतेहैं।

देश काल परभी खूब चर्चाहै। आम लोगोंख़ासकर बूढ़ी हो रहीपीढ़ी के ब्रेनवॉशकी भी समीक्षाकी गई हैजब मनोहर केचाचा कहते हैं, "आदमीतो बहुत फ़िटथे ये गाँधीजी। एतना कुछकिया देश के लिएबस एक ठोमिस्टेक कर दियाई आदमी,...."।उपन्यासकार भी इसपर अपनी टिप्पणीकरता है लेकिनबहस की डोरपकड़ाते हुए किप्रवचन देते हुए, "हैरीपॉटर और चेतनभगत को दिनरात एक करकेपढ़ने वाली पीढ़ी नेकभी गाँधी जीके लिए समयनहीं निकाला और गाँधीजीजैसे भी कईव्यक्तित्वों के बारेमें उनकी जानकारीकेवल पीढ़ी दर पीढ़ीएक दूसरे सेसुनी क़िस्से कहानियों केसहारे ही थीऔर उनकी सारीधारणाएँ भी इसीपर आधारित होतीथीं।" उपन्यासकार ने बसइस प्रकरण सेइस मुद्दे कोछुआ ही है।इससे जादा किया भीनहीं जा सकताक्यों कि कहानीका मुख्य कथानकयह विषय हैभी नहीं।

कहानी का मुख्यविषय हैं मुखर्जीनगर मेंसपने लिए युवाओं काप्रवेश, कोचिंग का मकड़जाल,बड़े शहर के प्रभावऔर बड़ा साहबबनने की काल्पनिकप्रक्रिया में युवाओं केव्यवहार में परिवर्तन औरसपनों के टूटतेया साकार होनेकी प्रक्रिया। इनसब बिंदुओं कोजिस स्पीड औरप्रभावी ढंग से बरतागया है वहतारीफ़ के क़ाबिलहै। विदिशा केवापस जाने का प्रकरणहो, मयूराक्षी-गुरुके संबंधों कासमापन हो याविमलेन्द्र की शादी।इस तरह केप्रकरण कहानी में एकाएकख़त्म होते हैं लेकिनबिना कुछ अधूरा छोड़े।मयूराक्षी के मुँहसे निकला वक्तव्य,"माफ़ कर दो,मैं जा रहीहूँ गुरु, मुझेबहुत आगे निकलना है.." यहप्रकरण और पूरावक्तव्य युवा पुरुषों कीमानसिकता को उधेड़कर रख देताहै। सबसे बड़ीबात यह हैकि कहानी पछतानेका मौक़ा भीनहीं देती है। क्योंकिज़माना कहानी की तरहतेज़ भागता रहता है।विदिशा की कसकको भी बड़ेशिद्दत के साथउभारा गया है कथानकमें।

विमलेन्द्र की शादीका प्रकरण हमारेअन्दर ही घिनपैदा करता है। एकतरफ़ चार करोड़ केदहेज़ वाली अरेंज्ड मैरेजहै तो दूसरीतरफ़ चेरी का साथनिभानेवाला लव मैरेजहै।

पात्र

कहानी में कईपात्र हैं। संतोष केंद्रीयपात्र है जिसकेचारों तरफ़ पात्रों काजमघट लगाया गया है।पात्रों का जमावड़ामुखर्जी नगर में कॉम्पीटीशनकी तैयारी केइकोसिस्टम के सम्पूर्णचित्रण को ध्यानमें रख करलगाया गया है। हरपात्र इस इकोसिस्टमके ख़ास पहलूको उजागर करदृश्य से हटजाता है नकि आगे भीबिना मतलब बना रहकर बोर करताहै। चाहे वहमयूराक्षी या विमलेन्द्रहै। रुस्तम हैया विदिशा है।ये सभी पात्रआते हैं अपनाज़िम्मे का कामकरके दृश्य से बाहरचले जाते हैं।'रायसाहब' भी एकहद तक आगेजाता है लेकिनउसका बने रहने कामक़सद जब समाप्तहो जाता हैतो वह भीदृश्य से हटजाता है। कहानी मेंएक बार आगेफिर आता हैबस ज़िक्र केतौर पर लेकिनउस वर्ग केलोगों की दिशाहीनतादिखाने के लिए।पायल भी अंततक बनी रहतीहै लेकिन बैकग्राउंडमें। अंत तक अगरतीन पात्र मनोहर,गुरु और संतोषबने रहते हैंतो इसलिए किकहानी को एकअंजाम तक पहुँचानाहै। मनोहर एकपात्र है जोअंत तक बनारहता है तोइस बात कोस्थापित करने के लिएकि वह निष्प्रयोजनतो है लेकिनबेफ़िक्र भी किवह अपना रास्तानिकाल लेगा। गुरू प्रेमचंदकी कहानी केबड़े भाई साहब कीतरह बना रहताहै अंत तकतो यह बतानेके लिए किसीरियस पढ़ाई में भीकोई कमी रहगई है। सन्तोषछोटे भाई की भूमिकामें है भीतो उस तरहनहीं जैसे प्रेमचंद कीकहानी में। वह खिलन्दड़प्रकृति का नहींहै। सन्तोष उसवर्ग का प्रतिनिधिहै जो लगनऔर कड़ी मेहनतसे अपनी कमीपूरी करता है।

अपने-अपनेमुखर्जी नगर

कथानक मुखर्जीनगर कोकेन्द्र में रख करबुना गया है। लेकिनजिस तरह सेकम्पीटीशन पास करने कामानसिक बोझ, निष्प्रयोजन मेहनत,दिशाहीनता, और सफलताभी, यहाँ काशाश्वत तथ्य और सत्यहै, यह कहानीकोटा, कानपुर, बनारस याऐसे ही अन्यमुखर्जीनगरों की कहानीभी बयान करतीहै। दरअसल हरव्यक्ति अपने समय मेंकिसी किसीमुखर्जीनगर से होकरगुज़रता है।

तीनपीढ़ियों को उबारनेका भार

आईएएस-आईपीएस याअन्य सिविल सेवाओं मेंचुने जाने का मानसिकदबाव इस बातको लेकर कि'तीन पीढ़ियों' का उद्धारहो जाएगा इसउपन्यास में बिलकुल जगहनहीं पा पाया।उपन्यास की यहीसबसे बड़ी कमी हैकि कहानी मुखर्जीनगरसे बाहर जबभी जाती हैतो गाँव औरशहर को बसछूकर वापस मुखर्जीनगर मेंलौट आती है।इसीलिए परीक्षा की तैयारीके पहलुओं परपूरी चर्चा है लेकिनइससे जुड़े भावनात्मक, मानसिकऔर सामाजिक पहलुओंपर विचार नहींहो पाया है।कहानी में माँ-बापसिर्फ़ पैसा भेजते रहजाते हैं। बस एकप्रकरण रायसाहब के गाँवका है लेकिनसंजीदा नहीं बन पाया।हाल ही कासमाचार है किकोटा में चयन परीक्षापास होने केबाद भी एकलड़की ने आत्महत्याकर ली क्योंकिवह इंजीनियर याडॉक्टर नहीं बनना चाहतीथी। ऐसे विषयोंको छूआ हीनहीं गया है। शायदउपन्यास को कुछतय पृष्ठों मेंसमेटने का दबावरहा हो याफिर इस उपन्यासके सिक्वेल कीतैयारी चल रहीहो।

करमवाबैरी हो गए हमार

अपनी सारी असफ़लताओंका ठीकरा भाग्यके माथे फोड़नेपर एक छोटीसी लेकिन दमदारबहस है औरइस प्रवृत्ति कोनकारते सन्तोष के प्रयत्नोंके माध्यम सेबहुत ही प्रभावशालीचित्रण भी है।गुरु जब चिल्लाताहै 'अरे मनोहरलाल,मेरे भाई जल्दी आओ,संतोष मिल गया है"तो यह डायलॉगभाग्यवाद को एकज़बरदस्त धक्का देता है।

ख़ूबसूरतमोड़

महेन्द्र कपूर कागाया एक मशहूरगीत है 'वोअफ़साना जिसे अंजाम तकलाना होमुमकिन, उसे एक ख़ूबसूरतमोड़ देकर छोड़ना अच्छा,चलो एक बारफ़िर से अजनबीबन जाएँ हमदोनों' यहपूरा उपन्यास पढ़ें यहजानने के लिएकि हमने खुदअपनी ज़िन्दगी में कबयह ख़ूबसूरत मोड़दिया और आजइस मुक़ाम परहैं। यह उपन्यासहमारे सफलताओं की कहानीकहता है। पढ़ें इसउपन्यास को औरअपने ज़माने के मुखर्जीनगर में खोजाएँ।

अगर आपने यह उपन्यास नहीं पढ़ा तो नहीं  जान पाएंगे कि नयी पीढ़ी क्या और किस शैली में लिख रही है और अपने ज़माने को किस नज़र से देख रही है 

 

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