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Title:
ख्वाहिशों के खांडववन
Description:
क्या विकास बाहरी रूप-रंग को प्रभावित करने वाले भौतिक उपकरणों में बदलाव का नाम है? या व्यक्ति और समाज के स्तर पर मनुष्यता और संस्कृति के अधिकाधिक उदार सहिष्णु और समन्वयकारी इन्सानी मनोवृत्ति ? अपने पहले उपन्यास 'ख्वाहिशों के खांडववन' में युवा लेखिका योगिता यादव ने इसी सवाल को गहरे कन्सर्न और रचनात्मक दबाव के साथ उठाया है। दिल्ली सरीखे महानगरों का कॉस्मोपोलिटन विस्तार गांवों और खेतों को लीलने की विनाश कथा ही नहीं कहता गांवों में धड़कती जिन्दगियों-संस्कृतियों सम्बन्धों के ताने-बाने को भी छिन्न-भिन्न कर डालता है। बार-बार उजड़ने और बसने की जीवन्तता को जीती दिल्ली यहां एक बार फिर विनाश और पुनर्मृजन के स्वप्न के बीच अपनी अस्मिता को पाने की जद्दोजहद में लीन है, लेकिन वर्चस्ववादियों की ताकतों को धता बताकर इस बार लेखिका निर्माण का दायित्व हाशिए की अस्मिताओं को सौंपती हैं। 'घायल की गति घायल जाने' वाली इस ब्रिगेड के पास अभाव, शोषण, दमन के बीच भाई-चारे को पहचानने और जमीन के साथ जुड़े रहने की संवेदना है तो अपने खंडित सपनों को पूरा करने का हौसला भी । स्वतःस्फूर्तता 'ख्वाहिशों के खांडववन' की ताकत है और इसके पाठ की कुंजी शीर्षक के भीतर छिपी प्रतीकात्मकता में दिल्ली के दिल में बसे गांवों में बोली जाने वाली भाषा अपने हरियाणवी संस्पर्श के कारण सिर्फ नया आस्वाद ही नहीं देती, बल्कि एक नये विषय को संवेदना की घटना के साथ विश्लेषित करने की मांग भी करती है। -रोहिणी अग्रवाल